Meera Bai के Guru संत Ravidas: गुरु-शिष्य परंपरा का एक अद्भुत संगम

meera ravidas

मध्यकालीन भारत का भक्ति आंदोलन एक ऐसा समय था जब प्रेम और भक्ति ने सामाजिक रूढ़ियों की दीवारों को तोड़ दिया था। इस आंदोलन के दो सबसे चमकते नक्षत्र हैं—मीरा बाई और संत रविदास। जहाँ मीरा बाई राजपूताना वैभव की राजकुमारी थीं, वहीं संत रविदास जी सादगी और मानवता के पुजारी थे। इस लेख का उद्देश्य यह समझना है कि कैसे एक ‘राजकुमारी’ ने एक ‘संत’ को अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक मानकर समाज को समानता का संदेश दिया।

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परिचय

संत रविदास जी का संक्षिप्त परिचय

संत रविदास (रैदास) जी का जन्म काशी (वाराणसी) के पास हुआ था। वे एक महान समाज सुधारक और निर्गुण धारा के संत थे। उनका सबसे प्रसिद्ध संदेश है—“मन चंगा तो कठौती में गंगा”। उन्होंने बाहरी आडंबरों के बजाय आंतरिक पवित्रता और सामाजिक समानता पर जोर दिया। उनके अनुसार, ईश्वर की नजर में कोई भी जाति या जन्म से छोटा या बड़ा नहीं होता।

मीरा बाई का संक्षिप्त परिचय

मेड़ता (राजस्थान) की राजकुमारी मीरा बाई बचपन से ही श्री कृष्ण की अनन्य भक्त थीं। चित्तौड़ के राणा सांगा के पुत्र भोजराज से विवाह के बाद भी उनकी भक्ति कम नहीं हुई। राजसी सुख-सुविधाओं को छोड़कर उन्होंने गलियों में साधु-संतों के साथ कीर्तन करना चुना, जिसके कारण उन्हें अपने परिवार और तत्कालीन समाज के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।

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मीरा बाई और संत रविदास का गुरु–शिष्य संबंध

लोक परंपराओं और कई भक्ति ग्रंथों के अनुसार, मीरा बाई ने संत रविदास जी को अपना गुरु स्वीकार किया था। यह संबंध उस समय के समाज के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी—एक उच्च कुल की स्त्री का एक ऐसे संत का शिष्य बनना जिन्हें समाज ‘अछूत’ मानता था।

  • भावनात्मक गुरु परंपरा: मीरा के लिए गुरु केवल दीक्षा देने वाला नहीं, बल्कि वह प्रकाश स्तंभ था जिसने उन्हें संसार की मोह-माया से पार पाने का मार्ग दिखाया।
  • लोकमान्यता: चित्तौड़ के कुंभ महल में संत रविदास की छतरी आज भी इस ऐतिहासिक संबंध की गवाह मानी जाती है।

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मीरा के पदों में गुरु रविदास का उल्लेख

मीरा बाई ने अपने कई पदों में स्पष्ट रूप से गुरु रविदास जी के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की है। उनके एक प्रसिद्ध पद की पंक्ति है:

“गुरु मिल्या रैदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी।”

इन पदों में ‘गुरु रैदास’ शब्द का उल्लेख इस बात का प्रमाण है कि मीरा की सगुण भक्ति (कृष्ण की पूजा) और रविदास जी की निर्गुण विचारधारा (निराकार ईश्वर) के बीच एक सुंदर समन्वय था। गुरु के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा ने ही उन्हें हर जहर का प्याला हँसकर पीने की शक्ति दी।

संत रविदास की शिक्षाओं का मीरा पर प्रभाव

रविदास जी की शिक्षाओं ने मीरा के जीवन को पूरी तरह बदल दिया:

  • जाति भेद का त्याग: गुरु की शरण में आकर मीरा ने जातिगत श्रेष्ठता के अहंकार को पूरी तरह त्याग दिया।
  • आडंबर रहित भक्ति: उन्होंने सीखा कि भक्ति मंदिर की मूर्तियों तक सीमित नहीं, बल्कि हृदय के समर्पण में है।
  • समानता का मूल्य: मीरा की जीवन शैली में यह साफ झलकता था जब वे राजमहल के सुख छोड़कर आम लोगों और वंचितों के साथ बैठकर भजन गाती थीं।.

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आज के समय में इस संबंध की प्रासंगिकता

आज के दौर में, जब समाज अक्सर धर्म और जाति के नाम पर विभाजित होता है, मीरा-रविदास का यह संबंध एक नई रोशनी देता है:

  • सामाजिक समानता: यह उदाहरण देता है कि ज्ञान और भक्ति किसी विशेष जाति की जागीर नहीं हैं।
  • स्त्री स्वतंत्रता: मीरा ने सदियों पहले दिखा दिया था कि एक महिला अपने आध्यात्मिक गुरु का चुनाव स्वयं कर सकती है और रूढ़ियों को तोड़ सकती है।
  • मानवता ही धर्म: यह संबंध सिखाता है कि मानवता और प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है।

संत रविदास जी का मीरा के जीवन पर प्रभाव केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि वैचारिक भी था। भक्ति आंदोलन में यह संबंध प्रेम, समर्पण और समानता का सबसे महान उदाहरण है। मीरा ने रविदास जी को गुरु मानकर यह सिद्ध कर दिया कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए ऊँचे कुल की नहीं, बल्कि ऊँचे विचारों और सच्चे हृदय की आवश्यकता होती है।

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