देवादिदेव महादेव, जो स्वयं चराचर जगत के स्वामी हैं, जब बालकृष्ण की मनमोहक लीलाओं के साक्षी बनने के लिए व्याकुल हुए, तो वे औघड़ रूप धरकर वृंदावन आ पहुँचे। भगवान शिव का माता यशोदा के द्वार पर अपने आराध्य के दर्शनों हेतु विनती करना, भक्ति के उस मधुर संबंध को दर्शाता है जहाँ स्वयं महादेव भी एक याचक बन जाते हैं।
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कृष्ण और महादेव मिलाप कथा – Mahadev Krishna Milaap Katha
ब्रजभूमि की पावन गलियों में एक बार एक अद्भुत लीला घटित हुई। कैलासपति महादेव के हृदय में बालकृष्ण के दर्शन की तीव्र अभिलाषा जाग उठी। प्रेम और भक्ति से अभिभूत होकर उन्होंने साधारण ब्राह्मण का वेश धारण किया और भिक्षा माँगते हुए नंदगाँव में यशोदा मैया के द्वार पर पहुँचे। क्योंकि उन्हें यह ज्ञान नहीं था कि सामने कौन है, माता यशोदा ने उस ब्राह्मण को आदरपूर्वक आसन दिया और भिक्षा में धन, अन्न तथा रत्न देने लगीं। पर ब्राह्मण बने महादेव ने वह सब स्वीकार करने से इनकार कर दिया और विनम्र स्वर में कहा कि उन्हें धन या वैभव नहीं चाहिए, उन्हें तो केवल नंदलाल के दर्शन चाहिए। यशोदा मैया ने मुस्कराकर बालकृष्ण को पुकारा। जैसे ही बालकृष्ण किलकारी भरते हुए सामने आए, ब्राह्मण का हृदय प्रेम से भर उठा, उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी और वे भीतर ही भीतर आनंद में डूब गए। उस क्षण भक्त और भगवान का भेद मिट गया—शिव स्वयं भक्त बनकर कृष्ण के रूप-सौंदर्य में लीन हो गए।
यशोदा मैया इस रहस्य से अनजान रहीं, पर उनकी निष्काम वात्सल्य भक्ति ही इस लीला का सार थी। यह कथा बताती है कि ईश्वर को पाने के लिए धन या पहचान नहीं, केवल सच्चा प्रेम और समर्पण ही पर्याप्त है।

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यह लीला केवल एक कथा नहीं, बल्कि यह दर्शाती है कि भक्ति में पद, रूप और पहचान का कोई महत्व नहीं होता। जहाँ प्रेम है, वहीं परम सत्य प्रकट होता है।
